रानी लक्ष्मीबाई

रानी लक्ष्मीबाई

1828-1858

भारत में जब भी महिला सशक्तिकरण की चर्चा होती है तब उसमें महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जी का उल्लेख अवश्य होता है। महारानी लक्ष्मीबाई ना केवल महिलाओं अपितु समस्त जन समुदाय जो देश प्रेम के जल से सिंचित है, उनके लिए आदर्श स्त्रोत रहीं है। रानी लक्ष्मीबाई जी ने अपने जीवन की समस्त चुनौतियों का सामना धैर्य, असीम आत्मबल और अदम्य जिजीविषा से किया। रानी लक्ष्मीबाई के रक्तरंजित पराक्रम का वर्णन करते हुए प्रसिद्ध कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान जी लिखती हैं- "लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार"। रानी लक्ष्मीबाई जी अपने जीवन की अंतिम श्वास तक विदेशी आक्रांताओं से मातृभूमि की रक्षा हेतु समर्पित रहीं एवं उसकी रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं। स्वाधीनता एवं स्वाभिमान हेतु उनके इस बलिदान ने बुन्देलखण्ड की धरा को सदैव के लिए उर्वरक तथा रानी लक्ष्मीबाई को भारतीय इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में यथार्थ कर दिया। मातृभक्ति की यह गौरवगाथा समस्त विश्व को प्रेरित करेगी। अप्रतिम शौर्य की प्रतिमूर्ति वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई को राजभाषा कार्यान्वयन समिति कोटि-कोटि श्रद्धासुमन अर्पित करती है एवं आशा करती है हम महिला सशक्तिकरण के ऐसे शाश्वत चिंतकों के आदर्शों से सीखकर सामाजिक विकास तथा वैयक्तिक पुरुषार्थ के नूतन पथ स्पंदित करेंगे।