रामधारी सिंह 'दिनकर'

रामधारी सिंह 'दिनकर'

1908-1974

'रोकिये जैसे बने इन स्वप्न वालों को, स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।'
~रामधारी सिंह दिनकर
'साहित्य अकादमी' तथा 'पद्म भूषण' से सम्मानित दिनकर जी की इन पंक्तियों से सम्बद्ध रचना वर्ष 1946 में स्वातंत्रवीरों की अंग्रेज़ी सरकार पर चढ़ाव की स्थिति को प्रदर्शित करते हुए सम्पूर्ण देश को दासता के बंधन से मुक्त कराने की ओर प्रेरित करने की दिशा में अहम भूमिका निभा रही थी। 1940 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में अंग्रेज़ों के विरुद्ध चल रहे राष्ट्रयज्ञ में अपनी कलम से आहुति देने वाले दिनकर जी के परिवार की आर्थिक स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही थी इस समस्या को दूर करने के उद्देश्य से दिनकर जी ने अपनी लेखनी की कुशलता के बल पर 1934 में अंग्रेजों के निबंधन विभाग में गीत प्रकाशक अधिकारी के रूप में कार्य करने का निर्णय लिया। अंग्रेज़ों के लिये कार्य करते हुए भी दिनकर जी की लेखनी सामंतवादी मानसिकता की दास न बन पायी वरन हुआ ये कि जिस लेखनी के बल पर उन्होनें व्यवसाय प्राप्त किया था उसी के द्वारा लिखित कविताओं से प्रज्ज्वलित चिंगारियों ने उनके लिए कई मुश्किलें उत्पन्न कर दी, फलस्वरूप 1938 से लेकर 1943 के मध्य दिनकर जी को 22 स्थानांतरणों का सामना करना पड़ा, इसी दौरान दिनकर जी की रचनाएँ स्थानीय पत्रिकाओं से उठकर राष्ट्रीय महत्व की पत्र-पत्रिकाओं में जगह बनाने लगीं। दिनकर जी