सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

1896-1961

छायावाद के प्रमुख स्तंभों में से एक सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' व उनकी पत्नी मनोहरा के जीवन का एक रोचक प्रसंग है। बांग्ला और हिन्दी की श्रेष्ठता को लेकर एक बार निराला और मनोहरा में द्वंद्व हुआ। रामकृष्ण परमहंस, रवींद्रनाथ ठाकुर, शरत चंद्रादि से प्रभावित निराला निस्संदेह बांग्ला की ओर थे, जबकि मनोहरा 'भारत दुर्दशा' को लेकर तर्क कर रहीं थीं। बहुत तर्क-वितर्क के बाद निराला के भीतर जैसे याज्ञवल्क्य जाग उठे ! ".... अति प्रश्न न कर गार्गी अन्यथा तेरा मस्तिष्क खंड-खंड हो जा जाएगा.....!" वे यह कहते हुए बीच से उठ गए कि "हमको स्त्री जाति से घृणा है..." एक बार निराला ने पत्नी से पानी माँगा, तब इस घटना की स्मृति कर वे बोलीं, "आपको स्त्री जाति से घृणा है। मैं स्त्री हुँ। बावड़ी स्त्री है। गंगा स्त्री है, फिर कहाँ से पानी लाऊँ? कोई तालाब हो तो पानी दिया जाए। यहाँ तो सभी स्त्रीलिंग हैं।" प्रतिदिन पत्नी के मुख से श्री राम स्तुति सुनकर वैसे ही कुछ रचने की ललक लिए हुए सुर्जकुमार ने कालांतर में 'राम की शक्ति पूजा', 'सरस्वती वंदना' और 'सरोज स्मृति' जैसी अप्रतिम सर्जनाएँ की। निराला के लिए जीवन कभी सरल नहीं रहा। बाल्यावस्था में माता, पिता के जाने के बाद प्राणों से प्रिय मनोहरा भी 21 वर्ष के निराला को छोड़कर चली गईं। ऐसे संघर्ष पूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले महाकवि 'निराला' को राजभाषा क