जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद

1889-1937

_(प्रसंग : वर्ष 1930 के आस-पास) चंद्रशेखर आज़ाद : मुझे लगता है कि मुझे अपने छुपने के स्थान में परिवर्तन करना होगा, मैं आपको हर बार मुश्किल में डाल देता हूँ, प्रसाद जी। जयशंकर प्रसाद (मुस्कुराते हुए) : "हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती " भारत को आज़ाद कराने के लिए आप जो लड़ाई लड़ रहे हैं, उसमें मैं कोई भी सहयोग कर सकूँ, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा! आप संकोच न करें, इस यज्ञ में हमें भी आहुति देने दें। __
एक ओर स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक पंडित चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारी मुखर होकर अंग्रेज़ों से लोहा ले रहे थे, वहीं अपने शब्दों से क्रांति की लौ जलाने वाले राष्ट्रवादी साहित्यकार एवं छायावाद के चार महान स्तम्भों में से एक जयशंकर प्रसाद जी ने हिंदी साहित्य की हर विधा द्वारा क्रान्ति की अग्नि प्रज्ज्वलित रखने का प्रयत्न किया। प्रसाद जी अपनी रचनाओं का उपयोग मात्र धन-अर्जित करने के लिए ही नहीं, अपितु जन-जाग्रति एवं मानव-मूल्यों की स्थापना करने हेतु भी किया करते थे, अतएव वे सचेत रहते थे कि उनकी कविता और उनका व्यवसाय हमेशा अलग-अलग रहे। प्रसाद जी के लेखन में राष्ट्रीयता के बोध के साथ-साथ मानव जीवन की संवेदनाओं का गहन चित्रण रहता था, जिसका अभूतपूर्व उदाहरण 1936 में प्रकाशित हुआ हिंदी साहित्य का सर्वकालिक श्रेष्ठ